अधर्म, अहंकार, अनाचार और अत्याचार की वृद्धि हुई तो जगत के पालनहार भगवान विष्णु ने विविध रूपों में अवतार लिया। उन्होंने हर अवतार में अधर्मी, अहंकारी, अनाचारी और अत्याचारी का नाश किया। भगवान विष्णु दस बार अवतार लेकर अपने विविध रूपों से धरती को अवगत करा गये। इसी कड़ी में भगवान विष्णु अपने छठे अवतार में भगवान परशुराम के रूप में मानव अवतार में अवतरित हुए। अन्य अवतारों में भगवान ने सीमित कार्य और उद्देश्य की पूर्ति कर पुनः अपने धाम को वापस चले गए। लेकिन, परशुराम भगवान विष्णु के एकमात्र ऐसे अवतार हैं, जो अपने बाद वाले के साथ भी सह-अस्तित्व में रहे। प्रभु श्री राम को परशुराम ने अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा करने के पश्चात अपने दादा को भगवान विष्णुं से प्राप्त धनुष ‘शारंग’ भगवान श्री राम को दिया। महाभारत काल में उन्होंने श्री कृष्ण को सुदर्शन चक्र देकर अपना प्रमाण दिया। शास्त्रों के अनुसार तो वे आज तक विद्यमान ही हैं। यह भी माना जाता है कि भगवान परशुराम भगवान विष्णु के दसवें अवतार, यानी कल्कि की मदद करने के लिए मौजूद हैं, जैसा कि कल्कि पुराण में कहा गया है। परशुराम की सिर्फ एक ही कहानी नहीं है, बल्कि पूरे भारत में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में कई अलग-अलग कथाएं प्रचलित हैं। मान्यताओं के अनुसार सात चिरंजीवियों का जन्म इस भारत भूमि पर हुआ है। उसमें भगवान परशुराम भी शामिल हैं। भगवान परशुराम जिन सात चिरंजीवी (अमर प्राणियों) में से एक हैं, उसमें हनुमान, कृपाचार्य, बलि, अश्वत्थामा, विभीषण और व्यास शामिल हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु ने इस पृथ्वी पर अहंकार और अत्याचार को नष्ट करने के लिए परशुराम के रूप में मानव अवतार लिया था। उनका जन्म ऋषि जमदग्नि और उनकी पत्नी रेणुका के यहाँ पुत्रेष्टि यज्ञ करने के बाद हुआ था। ब्राह्मण होते हुए भी उनमें क्षत्रिय के गुण थे। वैसे कहा जाता है कि उनके पिता के में भी क्षत्रिय के गुण थे। भगवान परशुराम धर्म, धैर्य, बुद्धि, विवेक, शास्त्र और सदाचार के साथ साहस, शौर्य, शक्ति, आक्रामकता और युद्ध कला सहित विभिन्न गुणों से संपन्न थे। परशुराम दो शब्दों का मिलन है परशु और राम। जिसमे परशु शब्द का अर्थ कुल्हाड़ी होता है, इसलिए परशुराम नाम का अर्थ है ‘कुल्हाड़ी वाला राम’।
परशुराम के बारे में कई किंवदंतियां प्रचलित हैं और वे रामायण और महाभारत के दौरान भी मौजूद थे। भगवान परशुराम तप और बल में अग्रणी होने के साथ ही न्याय के प्रबल पक्षधर तथा अहंकार और अत्याचार के विरोधी थे। भगवान परशुराम कई नामों से भी जाने जाते हैं, जैसे रामभद्र, भार्गव, भृगुपति, भृगुवंशी, जमदग्न्य, रेनुकेय, चिरंजीवी समेत कई नामों से उन्हें संबोधित किया जाता जाता है।
शास्त्रों के अनुसार परशुराम जी के गुरु स्वयं भगवान शिव थे। उन्होंने भगवान शिव से शास्त्रों और युद्ध की कलाओं को सीखा। फिर उन्होंने भगवान शिव के निर्देश पर भगवान शिव और अन्य देवताओं से आकाशीय हथियार प्राप्त किए। शिव ने अपने युद्ध कौशल का परीक्षण करने के लिए परशुराम को युद्ध के लिए बुलाया। गुरु और पालकी के बीच इक्कीस दिनों तक भयंकर युद्ध चला। परशुराम के युद्ध कौशल को देखकर भगवान शिव प्रसन्न हुए। परशुराम भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे, इसलिए उन्हें प्रसन्न करने के बाद उन्हें स्वयं भगवान शिव से कुल्हाड़ी मिली उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण अहंकारी राजा सहस्त्रार्जुन का वध करना था। सहस्त्रार्जुन को अपनी शक्ति का बहुत घमंड था और इस घमंड के कारण ऋषि-मुनियों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया था। एक बार सहस्त्रार्जुन के मन में भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि के आश्रम में मौजूद कामधेनु गाय को पाने का लोभ हो गया। अपने इस लोभ के कारण उसने महर्षि से कामधेनु गाय को बलपूर्वक छीन लिया और विरोध करने पर उनकी हत्या भी कर दी। पति की हत्या हो जाने के बाद परशुराम माँ रेणुका भी वियोग में चिता पर सती हो गयीं। इस घटना से क्रोध में आकर भगवान परशुराम ने सहस्त्रार्जुन का वध कर डाला। इसी घटना के आधार पर भगवान परशुराम के संबंध में एक गलत बात फैलाई गई कि वे एक वर्ग विशेष के विरोधी थे, जो सत्य से परे हैं। उन्होंने सिर्फ अधर्मी, अनाचारी, अत्याचारी और अहंकारी लोगों का नाश किया।
भगवान परशुराम एक ओर जहां भगवान विष्णु के अवतार के रूप में अहंकारी और अत्याचारी का नाश किया, वहीं भगवान शिव के प्रिय के रूप में कल्याण, न्याय और नीति को स्थापित किया। उन्होंने धर्म की स्थापना और जीव कल्याण की प्रेरणा दी। उन्होंने पृथ्वी पर हिन्दू वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करते हुए उसे स्थापित किया। मान्यता यह भी है कि भारत में मौजूद अधिकतर ग्राम भगवान परशुराम द्वारा ही बसाये गए हैं। संपूर्ण पृथ्वी जीतकर भी भगवान परशुराम स्वयं पहाड़ों को अपना आश्रय स्थल बना लिया और पूरी धरती दान में दे दी। भगवान परशुराम का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण तक में मिलता है।
आज भगवान परशुराम की जयंती के दिन हमें भगवान परशुराम के जीवन से प्रेरणा लेकर अधर्म और अनैतिक कार्यों से बचने का संकल्प लेना चाहिए ।
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