प्रयागराज। प्रबुद्ध फाउंडेशन, देवपती मेमोरियल ट्रस्ट, डा. अम्बेडकर वेलफेयर एसोसिएशन (दावा) और बाबासाहेब शादी डाट काम के संयुक्त तत्वावधान में सात से सत्रह आयु वर्ग के बच्चों के सृजनात्मक, कलात्मक और व्यक्तित्व विकास के लिये 26 दिसम्बर से जसरा गांव में संचालित एक तीस दिवसीय प्रस्तुतिपरक शीतकालीन प्रबुद्ध बाल रंग कार्यशाला का समापन गणतंत्र दिवस की 74 वीं वर्षगांठ के पावन अवसर एक शाम गणतंत्र दिवस के नाम पर जसरा स्थित ईश्वरदीन गेस्ट हाउस में प्रबुद्ध बाल रंग महोत्सव-2024 का आयोजन कर दर्जनों नृत्य, नाटक व गायन की प्रस्तुतियां रंगकर्मी/ रंग निर्देशक रामबृज गौतम के निर्देशन में की गई।
एक ओर जहां प्रबुद्ध बाल रंग महोत्सव-2024 में सर्वप्रथम बच्चों ने बुद्ध वंदना, भीम वंदना की और कबीरा कहे ये जग अंधा, बुद्धं शरणं गच्छामि, तेरी आरती उतारू रे, हम भीमराव के बच्चे है जैसी आधा दर्जन से अधिक नृत्य नाटिकाओं व गीतों की प्रस्तुतियां देकर बच्चों ने दर्शकों को भाव विभोर कर दिया तो वहीं दूसरी ओर जीवन के रंग, मां कह एक कहानी, बेटी, अंगुलिमाल, महादानी राजा बलि, पाखंड, परिवर्तन का महानायक जैसी आधा दर्जन से अधिक लघु नाटकों की प्रस्तुतियों ने बहुजन साहित्य, कला और संस्कृति के साथ-साथ बहुजन रंगमंच को पुनर्स्थापित करने के साथ साथ बहुजन समाज की गैर-राजनैतिक जड़ो को मजबूत करते हुये बहुजन समाज की अपनी खोई हुई बहुजन संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और उसके विकास के साथ-साथ बहुजन समाज की विलुप्त हुई विरासत को प्राप्त कर हुक्मरान व शासक कौम बनाने की बात करती दिखी।
नाटक जीवन के रंग में अंधविश्वास, पाखण्ड और कुरीतियो से मुक्त होकर वैज्ञानिक सोच के आधार पर गीता सिलाई कर करके अपने रश्मि बेटी को डॉक्टर, विनोद बेटा को इंजीनियर और प्रकाश बेटे को बहुत बड़ा साहित्यकार बनाती है। वही गीता की पड़ोसन सीता पुत्र प्राप्ति हेतु चारो धाम, चर्च, मस्जिद और गुरुद्वारा तक मत्थे टेक आती है फिर भी उसे पुत्र प्राप्ति नही होती और अंततः गीता के कहने पर सीता अनाथालय से एक बच्चा गोंद लेकर समाज कार्य से जुड़कर माहिलाओं में वैज्ञानिक सोच विकसित करने की बात करती है।
नाटक बेटी रंग निर्देशक आईपी रामबृज की आत्मकथा पर आधरित है। माँ के गर्भ से बेटी का कथोपकथन की तुम बेटी को बचाओगे? आज तो बेटी को बचाओगे कल गंदी सोच के लोग दामिनी की तरह नोच खाएंगे। वहां से बच गए तो दहेज के नाम पर जिंदा जला दिए जायेंगे। जब कोख से बुढापे तक रोना ही लिखा है तो क्यों आये हम इस दुनिया मे? किसी को मा चाहिये, बहन चाहिये, बीबी चाहिए लेकिन बेटी किसी को नही चाहिये।ओस की बूंद होती है बेटियां, मा-बाप को दर्द को तो रोती है बेटियां, घर को रोशन करती है बेटियां, बेटा सिर्फ एक कुल, बेटा सिर्फ एक कुल दो दो कुलों की लाज होती है बेटियां। क्यो नही चाहिये बेटियां, आखिर हमारा कुसूर क्या है?रिया मौर्या के इस कथोपकथन से पूरे दर्शकों से प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हुये रोने पर विवश करता है।
नाटक अंगुलिमाल में तथागत बुद्ध ने अपने प्रेम, करुणा, शील, समाधि, प्रज्ञा, दया व मैत्री से अंगुलिमाल जैसे दुद्रांन्त डाकू को हथियार त्यागने पर विवस कर देता है। बुद्ध का कथोपकथन कि जब हम किसी को जीवन दे नहीं सकते तो उसका जीवन ले भी नही सकते है।
वहीं दूसरी ओर पूर्व राज्यपाल माताप्रसाद द्वारा लिखित नाटक महादानी राजा बलि में दिखाने का प्रयास किया गया कि आज से हजारों हजार साल पहले श्रमण संस्कृति का वाहक राजा बलि ही वह राजा था जिसकी दानवीरता विश्व विख्यात थी, जिसको देवताओं ने कैसे छल, कपट से उसका राज्य छीनकर उसका बध कर देते है यानी बलि कुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई को तथाकथित असमानता की व्यवस्था के पोषक लोगों ने बलि के स्थान पर रघुकुल रीत सदा चलि आई कर दिया यानी श्रमण संस्कृति पर लीपापोती कर आर्य संस्कृति को प्रतिस्थापित कर दिया गया को दिखाने का प्रयास किया गया है।
नाटक पाखंड के माध्यम से दिखाने का प्रयाश किया गया है कि समाज में असमानता के पोषक सनातनधर्मी वर्णाश्रम व्यवस्था के संस्थापक लोगों को देश की आजादी के पचहत्तर साल बाद आज भी बहुजनों के निचले पायदान से लेकर ऊपरी पायदान तक बाबासाहेब के संविधान व शिक्षा के माध्यम से अच्छे अच्छे पदों पर पदस्थापित होना स्वीकार नही कर पा रहे है। अंधविश्वास, पाखंड और कुर्तियों के जाल में बहुजन समाज को किस तरह से मूर्ख और धूर्त बनाकर सत्यनारायण की कथा सुनाकर कैसे दूसरे का धन संचय किया जाता है दिखाया गया है। नाटक द्वारा देश में फैले जातिवाद से कैसे मुक्त हुआ जा सकता है को दिखाया गया है।
नाटक परिवर्तन का महानायक बहुजन नायक कांशीराम के संघर्षों पर आधारित है जो सत्ता पर पूजीपतियों और सामंतों के कब्जे से मुक्त कराकर बहुजनों में राजनैतिक सत्ता की ललक पैदा करने सोच पैदा की। विना सामाजिक क्रांति के बहुजनों को सत्ता प्राप्ति असम्भव है और सत्ता विंना संघर्ष के नही मिलती इसे नाट्य प्रस्तुती के माध्यम से दिखाया गया है।
परिकल्पना एवं निर्देशन प्रबुद्ध फाउंडेशन के प्रबंधक/सचिव रंगकर्मी रंग निर्देशक आईपी रामबृज द्वारा किया गया। रिया मौर्या-बेटी, सीतू-वरुण- पगली- गंगा, रिया-महामंत्री-पड़ोसन, सोनम-प्रसेनजित-नारद-सीता, शिवानी-गीता-राजा बलि, आराध्या-बुद्ध-बृहस्पति, विनोद-अंगुलिमाल-रामेश्वर, राजू राव-दिनेश-ब्राह्मण, कारन-द्वारपाल-रोहित और अंकित-भिच्छू की अभिनय की दर्शकों ने तारीफ की। साक्षी, मोनिका, काजल, नेहा, सुनेहा, सुहानी, मानशी, लक्ष्मी, हर्ष ने अपने अपने अभिनय के साथ न्याय किया।
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