प्रयागराज। जीवन की तरह विचार भी नश्वर है यदि विचारों का प्रचार - प्रसार नहीं होगा तो वह भी ठीक उसी तरह नष्ट हो जाएंगे जिस तरह बिना उचित देखरेख के पेड़-पौधे सूख जाते हैं। यह विचार उस महान मनीषी के हैं जिसे संसार ने तरह-तरह की उपाधियों से विभूषित किया। किसी ने उन्हें विश्वरत्न की उपाधि दी तो किसी ने बोधिसत्व की। राष्ट्रनायक बहुजनों के मुक्तिदाता परम पूज्य डा. बाबासाहेब भीमराव रामजी आम्बेडकर केवल ज्ञान के प्रतीक ही नहीं बल्कि वह भारतीय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आंदोलन के ऐसे पुरोधा हैं जिनका संपूर्ण जीवन दर्शन भारतवर्ष को एक राष्ट्र बनाने हेतु समर्पित रहा । उन्होंने कहा कि व्यक्ति की " सामाजिक स्वतंत्रता " ही सर्वोपरि है। सामाजिक स्वतंत्रता के बिना कानूनी और राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई मोल नहीं है। संसार के अन्य विद्वान जहां " अर्थ " को महत्ता प्रदान करते हैं वहीं पर बाबासाहेब ने " सम्मान " को श्रेष्ठता प्रदान की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राजनीतिक और आर्थिक अत्याचार सामाजिक अत्याचार के मुकाबले कुछ भी नहीं है हालांकि मार्क्स की तरह उन्होंने धर्म को अफीम की संज्ञा प्रदान नहीं की परंतु इतना जरूर कहा कि जो धर्म जन्म से ही एक व्यक्ति को श्रेष्ठ और दूसरे को नीचा समझने का कार्य करता है वह धर्म नहीं बल्कि मानव को गुलाम बनाए रखने का एक षड्यंत्र है इसीलिए राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब लोगों के बीच से जाति, नस्ल या रंग का अंतर भुलाकर उन्हें सामाजिक भ्रातत्व प्रदान किया जाए। यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतवर्ष के विकास में बाबासाहेब के योगदान की समीक्षा की जाए तो मुझे नहीं लगता कि कोई भी क्षेत्र ऐसा होगा जहां बाबासाहेब की दृष्टि न गई हो परंतु तत्कालीन परिस्थितियों में भारतीय संविधान का निर्माण करना एक ऐसा ज्वलंत विषय था जिस पर कार्य करना अत्यधिक मुश्किल था। बाबासाहेब ने विभिन्न देशों के संविधानों के अध्ययन के उपरांत भारतीय संविधान का निर्माण किया जिसे आज भी विश्व में सर्वोपरिता हासिल है क्योंकि भारतीय संविधान में विश्व के श्रेष्ठतम संविधानों के गुण समाहित है। संविधान की सीमाओं में रहकर आज हम सभी अपना अपना विकास कर रहे हैं। सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक, वैज्ञानिक एवं दार्शनिक कोई भी क्षेत्र हो - सभी को किस तरह कार्य करना है का उल्लेख भारतीय संविधान में किया गया है। शायद इसीलिए बाबासाहेब ने कहा था कि संविधान मात्र वकीलों का दस्तावेज नहीं है बल्कि यह जीवन जीने का एक माध्यम है। इसीलिए हम सभी को भारतीय संविधान का आदर करते हुए उसका संरक्षण करना चाहिए। बाबासाहेब ने गुलामी और दासता का पुरजोर विरोध किया और वैज्ञानिकवादी विचारधारा का व्यापक प्रचार प्रसार करते हुए कहा कि भाग्य में नहीं बल्कि अपनी शक्ति में विश्वास रखो और अपनी शक्ति के बल पर अपना मुकाम हासिल करो। गुलाम बनकर जिओगे तो कुत्ता समझकर लात मारेगी यह दुनिया और नवाब बनकर जिओगे तो शेर समझ कर सलाम ठोकेगी यह दुनिया। यह विचार मात्र मानव का मनोबल बढ़ाने हेतु नहीं है बल्कि जॉन स्टूअर्ट मिल की तरह व्यक्तिपरक विचार है जिससे स्पष्ट है कि बाबासाहेब ने व्यक्ति को श्रेष्ठता प्रदान की है। उन्होंने बुद्धि के विकास को ही मानव के अस्तित्व का अंतिम उद्देश्य माना और कहा कि प्रत्येक कौम को अपने इतिहास का मान होना जरूरी है क्योंकि जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती वह अपना और अपने समाज का और अंततः राष्ट्र का विकास नहीं कर सकती। व्यक्ति को अपने अधिकारों के प्रति सजग करते हुए उन्होंने कहा कि सफल क्रांति के लिए असंतोष होना ही काफी नहीं है इसके लिए न्याय, राजनैतिक और सामाजिक अधिकारों में गहरी आस्था होना भी आवश्यक है अर्थात हमें अपने अधिकारों के प्रति सजग रहते हुए क्रांति तो करनी है परंतु वह क्रांति भारतीय कानून की सीमाओं के अंतर्गत होनी चाहिए। बाबासाहेब व्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती हैं परंतु स्वच्छंदता के नहीं। नारियों के उत्थान एवं उनके स्वाभिमान हेतु बाबासाहेब द्वारा अभूतपूर्व कार्य किए गए उन्होंने यहां तक कहा कि मैं किसी समाज की प्रगति इस बात से आंकलित करता हूं कि उस समाज में महिलाओं की स्थिति कैसी है। हिंदू कोड बिल जैसे मुद्दे पर उन्होंने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा देना उचित समझा शिवाय इसके कि वह नारी सम्मान से समझौता करें। बाबासाहेब ने कहा कि कोई भी सुधार तब शुरू होता है जब व्यक्ति अपने समुदाय के मानकों, समुदाय की सत्ता और समुदाय के हित से ऊपर अपने विचारों को तरजीह देता है। किसी भी देश का भविष्य उसके बुद्धिजीवी वर्ग पर निर्भर करता है यदि बुद्धिजीवी वर्ग ईमानदार स्वतंत्र और निष्पक्ष है तो उस पर भरोसा किया जा सकता है कि वह संकट की घड़ी में पहल करेगा और उचित नेतृत्व प्रदान करेगा।
अफसोस इस बात का है बाबासाहेब का दर्शन इतना स्पष्ट होने के बावजूद भी भारतवर्ष में उन्हें वह सम्मान नहीं प्राप्त हुआ जिसके वह वास्तविक हकदार थे और उसका मूल कारण यह था कि उन्होंने एक ऐसे समाज में जन्म लिया जिस समाज को जन्म से ही नीच और अछूत माना जाता था इसलिए बाबासाहेब ने 13 अक्टूबर 1935 को नासिक के एवला मैदान में सिंह गर्जना करते हुए कहा था कि यद्यपि हिंदू धर्म में जन्म लेना मेरे बस की बात नहीं थी परंतु मैं एक हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं यह मेरे बस में है और इसके ठीक 21 वर्ष बाद अपने लाखों अनुयायियों के साथ उन्होंने भारतवर्ष में विलुप्तप्राय मानवतावादी बौद्ध धम्म स्वीकार कर अपनी इस भीम गर्जना को मूर्त रूप प्रदान किया। आज के वैश्विक सार्वभौमीकरण युग में बाबासाहेब की समस्त संकल्पनाऐं अत्यधिक प्रासंगिक है क्योंकि विश्व के विकसित राष्ट्रों में बाबासाहेब के दर्शन पर सतत् शोध होते रहते हैं। भारतीय संस्कृति में जाति के आधार पर व्यक्ति को सम्मान प्रदान किया जाता है और उसके ज्ञान एवं संघर्ष का आंकलन किया जाता है जबकि अन्य विकसित राष्ट्रों में व्यक्ति के गुणों को महत्ता प्रदान की जाती है उसकी जाति को नहीं इसीलिए बाबासाहेब डा. आम्बेडकर विश्व गौरव हैं । विश्व प्रसिद्ध --''OXFORD UNIVERSITY''-- ने एक किताब---''THE MAKER OF UNIVERSE''-- प्रकाशित की जिसमें 10,000 साल में हुए सबसे महान 100 मानवतावादी महान पुरुषों की सूची जारी की गई है। इस सूची सबसे ऊपर (1) --''महामानव तथागत बुद्ध'' (2 ) पर--' "वर्धमान महावीर" -- (3 ) पर--''सम्राट अशोक''--और (4) पर ---'''बोधिसत्व डा. बाबासाहेब भीमराव रामजी आम्बेडकर'''--- का नाम दर्ज है।
6 दिसंबर 1956 को बाबासाहेब अपने करोड़ों अनुयायियों को विषम परिस्थितियों में रोता बिलखता छोड़ कर परिनिर्वाण को प्राप्त हो गए। बाबासाहेब के सच्चे अनुयाई आज भी उनके कारवां को आगे बढ़ाने में प्रयत्नशील है। आइए हम सभी उस विश्वरत्न के बताए गए मार्ग पर चलने हेतु संकल्प लें और उनके विचारों को सदैव प्रचारित और प्रसारित करते रहने हेतु भी प्रतिबद्ध रहें ।
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