एनसीईआरटी की हिंदी अंतरा-दो के पाठ्यक्रम से महाप्राण निराला की कविता हटाए जाने से उनके वंशज आहत हैं। उनके घर को जाने वाली दारागंज की गलियों में भी इसकी पीड़ा है। अफसोस से भरे महाप्राण के प्रपौत्र कवि विवेक निराला कहते हैं कि पीढि़यां पाठ्यपुस्तकों से ही तैयार होती हैं। निराला-फिराक को पाठ्यक्रम से हटाया जाना नई पीढ़ी को उसकी विरासत से बेदखल करना है।
निराला की कविता गीत गाने दो मुझे... को एनसीईआरटी की 12वीं की हिंदी पुस्तक अंतरा-दो से हटाए जाने के बाद शुक्रवार को पहली बार उनके वंशज विवेक निराला ने अपनी पीड़ा साझा की। अमर उजाला से बातचीत में उनका कहना था कि दरअसल निराला के गीत और फिराक की गजल को पाठ्यक्रम से हटाए जाने का मसला पूरे देश के लिए विचारणीय होना चाहिए। निराला और फिराक दोनों ही हिंदी-ऊर्दू की साझी विरासत के प्रतिनिधि हैं और दोनों महान रचनाकारों का संबंध सबको मिलाने, जोड़ने की संगम की भूमि प्रयागराज से है।
यह धरती कभी तोड़ती नहीं, हमेशा जोड़ती रही है। एनसीईआरटी के इस कदम पर वह कहते हैं कि प्रयागराज के नागारिकों और प्रबुद्धजनों की जिम्मेदारी बनती है कि वह इसका खुलकर विरोध करें। निराला देश की सस्किृतिक चेतना के प्रतिनिधि हैं, इन्हें पाठ से बाहर करना उचित नहीं है। उनके प्रपौत्र विवेक कहते हैं कि निराला हमेशा प्रतिपक्ष की आवाज रहे हैं। निराला शाश्वत प्रतिपक्ष के कवि हैं। इसीलिए अपने समय की सत्ताओं ने उन्हें बर्दाश्त नहीं किया।
वह कहते हैं कि एक पीढ़ी पाठ्यपुस्तकों से तैयार होती है। निराला को पाठ्यक्रम से हटाकर नई पीढ़ी को उसकी विरासत से बेदखल किया जा रहा है। नई पीढ़ी को उसकी सांस्कृतिक चेतना के बोध से वंचित किया जा रहा है। ऐसे महान कवियों के साथ क्या सलूक होना चाहिए, यह हमे देखना चाहिए। विवेक कहते हैं कि एनसीईआरटी को अपने इस निर्णय को वापस लेना चाहिए। विवेक ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से आग्रह किया है कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करें, ताकि निराला को पढ़ने से नई पीढ़ी वंचित न रह जाए।
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