संसद के केंद्रीय कक्ष में मध्यरात्रि को घंटा बजने के साथ ही पूरा देश आर्थिक तौर पर एक इकाई में बदल गया।
71 साल पहले 15 अगस्त 1947 को देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ। लालकिले की ऐतिहासिक प्राचीर से यूनियन जैक उतर चुका था। तिरंगा शान से लहरा रहा था। राजनीतिक आजादी के साथ देश विकास के रास्ते पर आगे बढ़ने की योजना बनाने लगा। तमाम तरह की अड़चनों के बावजूद देश आगे बढ़ रहा था, लेकिन उन सबके बीच सुधारों की संभावनाओं को जन्म भी दे रहा था। देश की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में समय-समय पर बदलाव की जरूरत महसूस की गई। अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में सुधार की दिशा में पहली बार 1978 में गंभीरता से मंथन हुआ। करीब चालीस साल के बाद देश के राजनेताओं में ये सहमति बनी कि अब देश को एक आर्थिक इकाई में बदलने की जरूरत है। लेकिन अप्रत्यक्ष करों के सफरनामे पर जाने से पहले ये जानना जरूरी है कि 30 जून और 1 जुलाई की मध्यरात्रि क्यों महत्वपूर्ण है।
ये रात ऐतिहासिक है। संसद के केंद्रीय कक्ष में घंटा बजाने के साथ ही पूरे देश में एक कर व्यवस्था लागू हो जाएगी। देश के राज्यों की सीमाएं भले ही एक-दूसरे को अलग करती हों। लेकिन आर्थिक रूप से पूरा देश एक इकाई में बदल जाएगा। संसद के विशेष सत्र में जिस वक्त जीएसटी लागू होगा वो उस तस्वीर को याद दिला रहा होगा, जब देश के पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू ने देश के साथ एक वादा किया था। पीएम नरेंद्र मोदी उस ऐतिहासिक क्षण पर देश को संबोधित करेंगे, जिस पर पूरे देश की निगाह टिकी है। लेकिन उस ऐतिहासिक क्षण का गवाह बनने से पहले ये जानना भी जरूरी है कि जीएसटी को मंजिल पर पहुंचने के लिए जमीन पर सफर तय करने में कितना समय लगा।
जीएसटी का सफरनामा
1978- एल के झा की अगुवाई में एक समिति ने अप्रत्यक्ष कर को मॉडिफाइड वैल्यू एडेड टैक्स (MODVAT) में बदलने का सुझाव दिया था। एल के झा लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव होने के साथ-साथ रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर भी थे।
1986- राजीव गांधी सरकार में वित्त मंत्री रहे वी पी सिंह ने बजट में मॉडिफाइड वैल्यू एडेड टैक्स (MODVAT) को शामिल किया। इस पूरी कवायद का मकसद था कि उत्पादनकर्ता को कंपोनेंट और कच्चे माल पर अदा किए जाने वाले एक्साइज ड्यूटी की जल्द से जल्द भरपाई की जा सके। इसके साथ ग्राहकों को महंगाई से राहत दिलाई जा सके।
1991-92- पी वी नरसिंहाराव सरकार में वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह ने राजा चेलैय्या की अध्यक्षता में टैक्स रिफॉर्म कमीशन बनाया। आयोग ने माडवैट (MODVAT) की जगह वैट और सर्विस टैक्स लागू करने का सुझाव दिया। सेवाओं को 1994 में पहली बार टैक्स के दायरे में लाया गया।
1997- एच डी देवेगौड़ा की यूनाइटेड फ्रंट की सरकार में वित्त मंत्री रहे पी. चिदंबरम ने अपना ड्रीम बजट पेश किया। उन्होंने पीक कस्टम ड्यूटी को 50 फीसद से 40 फीसद करने का फैसला किया। इसके अलावा टैक्स संरचना में और सुधार करने पर जोर दिया।
1999- अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने टैक्स सुधार की दिशा में काम करना शुरू किया। केंद्र और राज्यों के बीच सेल्स टैक्स को लेकर जो विवाद पहले से चल रहा था उसे खत्म करने की कोशिश की गई। टैक्स की जटिल प्रणाली को सरल बनाने की पहल हुई। संघीय ढांचे का सम्मान करते हुए पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता की अगुवाई में एक एंपावर्ड कमेटी का गठन किया और पूरे देश में वैट लागू करने की योजना पर काम शुरू हुआ।
2001-02- एक अप्रैल 2002 को वैट को लागू करने का फैसला किया गया। लेकिन भाजपा शासित राज्यों के साथ-साथ दूसरे राज्यों के विरोध की वजह से इसे एक साल के लिए टाल दिया गया।
2003- अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने विजय केलकर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस समिति ने फिस्कल रेस्पांसिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट (FRBM) एक्ट का सुझाव दिया। कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स का पहला स्वरूप तय हुआ। कमेटी ने राज्यों के लिए 7 फीसद और केंद्र के लिए 5 फीसद टैक्स तय करने का सुझाव दिया गया। इसके साथ ही वैट को 1 अप्रैल 2005 तक के लिए टाल दिया गया
2005- एक अप्रैल 2005 को स्टेट वैट लागू किया गया।
2007- वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने बजट स्पीच में अप्रैल 2010 से जीएसटी लागू करने का ऐलान किया। इसके लिए एक एंपावर्ड कमेटी का गठन किया गया। आम सहमति बनाने के लिए असीम दासगुप्ता और सुशील कुमार मोदी राज्यों के प्रतिनिधियों से मिलकर आम सहमति बनाने में जुट गए ।
2009- वित्त मंत्री के सलाहकार पार्थसारथी शोम ने जीएसटी पर पहला पेपर पेश किया।
2009-10- जीएसटी को शामिल करने के लिए 13वें वित्त आयोग के टर्म्स ऑफ रेफरेंस के दायरे को बढ़ाया गया। आयोग ने राज्यों को होने वाले नुकसान की भरपाई का सुझाव दिया।
2011- वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने जीएसटी फ्रेमवर्क के लिए 115वां संविधान संशोधन बिल पेश किया। यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली स्थाई समिति को ये बिल भेजा गया। स्थाई समिति ने 2013 में रिपोर्ट पेश की। लेकिन भाजपा शासित राज्यों और तमिलनाडु ने बिल का जबरदस्त विरोध किया।
2013-14- यूपीए सरकार जीएसटी बिल को संसद से पारित कराने में नाकाम रही। लेकिन इंफोसिस के पूर्व सीइओ नंदन नीलेकणि की अगुवाई वाली कमेटी ने द गुड्स एंड सर्विसेज टैक्सेशन नेटवर्क को प्रमोट करने की संस्तुति की।
2014-15- वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दिसंबर 2014 में लोकसभा में जीएसटी से संबंधित संशोधन बिल पेश किया जिसे 2015 में लोकसभा ने पारित कर दिया। लोकसभा से बिल को पारित होने के बाद राज्य सभा की सलेक्ट कमेटी को भेजा गया।
2016- राज्यसभा ने जीएसटी बिल को पारित कर दिया, इसके साथ ही अलग-अलग तरह के सामानों की दरों को निर्धारित करने के लिए जीएसटी काउंसिल का गठन किया गया। सरकार की मंशा थी कि एक अप्रैल 2017 से जीएसटी को लागू किया जाए, लेकिन बाद में उस तिथि में बदलाव किया गया।
2017- वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अलग-अलग दलों के कद्दावर नेताओं और राज्यों से लगातार बातचीत की और जीएसटी को एक जुलाई 2017 से लागू करने का ऐलान किया।
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