खबर है कि चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने गुरुवार को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के प्रमुख सलाहकार पद से इस्तीफा दे दिया. कांग्रेस पार्टी की, खासकर अमरिंदर सिंह की, चुप्पी इस बात का साफ़ संकेत है कि उन्हें या तो पूरे 440 वोल्ट का झटका लगा है या फिर सांप सूंघ गया है. किसी को भी शायद अंदेशा नहीं था कि प्रशांत किशोर कुछ ऐसा करने वाले हैं. यह जानने से पहले कि इसका आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव पर क्या असर होगा, यह जानना जरूरी है कि प्रशांत किशोर ने ऐसा क्यों किया? प्रशांत किशोर ने अपना त्यागपत्र अमरिंदर सिंह को भेजा है, हालांकि मुख्यमंत्री कार्यालय का कहना है कि उन्हें अभी प्रशांत किशोर का त्यागपत्र प्राप्त नहीं हुआ है. ख़बरों के अनुसार प्रशांत किशोर ने कहा है कि वह सार्वजनिक जीवन से फ़िलहाल अस्थायी ब्रेक ले रहे हैं, और उन्होंने यह तय नहीं किया कि वह भविष्य में क्या करेंगे. अगर यही सच है तो सवाल उठना लाजिमी है की उन्होंने अभी तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सलाहकार पद से इस्तीफा क्यों नहीं दिया है? पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद उनकी कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट ममता बनर्जी सरकार ने 2024 के लोकसभा चुनाव तक बढ़ा दिया था और उनकी टीम इन दिनों तृणमूल कांग्रेस को त्रिपुरा में मजबूत करने में लगी है. यानि दाल में कुछ काला तो जरूर है, जो ना प्रशांत किशोर बताना चाहते हैं ना ही अमरिंदर सिंह.
मार्च के महीने में प्रशांत किशोर को पंजाब के मुख्यमंत्री का प्रमुख सलाहकार नियुक्त किया गया था और उनको एक कैबिनेट मंत्री का दर्ज़ा दिया गया था, जिसके तहत उनको एक मंत्री को मिलने वाली तनख्वाह और भत्ता दिया जाना था. प्रशांत किशोर ने उस समय यह घोषणा की थी की वह सिर्फ 1 रूपये प्रतिमाह के वेतन पर काम करेंगे. उन्हें बंगला, गाड़ी, स्टाफ, इत्यादि भी मिलना था जो अभी तक उन्होंने ली नहीं थी. मार्च में पद पर नियुक्ति के बाद वह सिर्फ एक बार ही पंजाब गए थे और एक बार पिछले दिनों अमरिंदर सिंह नई दिल्ली आये थे, दोनों की मुलाकात हुई थी. 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत का श्रेय प्रशांत किशोर की रणनीति को दी गयी थी. उनका नारा ‘पंजाब दा कैप्टन’ और ‘कॉफ़ी विद कैप्टन’ काफी सफल रहा था.
जिस तरह अमरिंदर सिंह के नवजोत सिंह सिद्धू का विरोध करने के बावजूद सिद्धू की पिछले महीने पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद पर नियुक्ति के बाद चुप हो गए थे, लगने लगा था कि कहीं ना कहीं यह प्रशांत किशोर की रणनीति का नतीजा है, क्योंकि चुनाव जीतने के लिए पार्टी को दोनों नेताओं की जरूरत है. राजनीति में कई बातें स्पष्ट नहीं की जाती, ऐसा क्यों हुआ जानने के लिए कई घटनाओं को जोड़ कर उसका निष्कर्ष निकलना पड़ता है.
पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद प्रशांत किशोर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में सक्रिय हो गए थे. एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार से पहले मुंबई और फिर दिल्ली में मिले. दिल्ली में पवार के घर पर विपक्षी दलों की एक बैठक हुई जिसमें अगले लोकसभा चुनाव के बारे में मंथन किया गया. प्रशांत किशोर कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता प्रियंका गांधी, राहुल गांधी और सोनिया गांधी से मिले. खबर थी कि प्रशांत किशोर कांग्रेस पार्टी ज्वॉइन करने वाले हैं. उन्होंने कांग्रेस पार्टी को इस बात की परियोजना भी सुझाई थी कि कैसे कांग्रेस पार्टी फिर से एक मजबूत पार्टी बने और 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की पराजित किया जाए.
ख़बरें थीं कि कांग्रेस पार्टी उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाना चाहती थी पर प्रशांत किशोर ने पद लेने से मना कर दिया. चूंकि कांग्रेस पार्टी सही समय पर फैसले नहीं लेने के लिए जानी जाती है, प्रशांत किशोर ने सुझाव दिया था कि पार्टी में एक एडवाइजरी कमिटी बनाई जाए, जिसके वह भी सदस्य होंगे. यह कमिटी बिना समय गंवाए निर्णय लेगी और अगर जरूरत पड़ी तो उस निर्णय की पुष्टि कांग्रेस वर्किंग कमिटी करेगी. प्रशांत किशोर कांग्रेस पार्टी के अन्दर लालफीताशाही प्रथा को समाप्त करना चाहते थे. उनकी रणनीति का एक मुख्य उद्देश्य था 2024 के लोकसभा चुनाव के तहत सभी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाना, जिसके बिना फ़िलहाल ऐसा नहीं लगता है कि विपक्ष बीजेपी को हरा पाएगी.
प्रशांत किशोर का गांधी परिवार से मीटिंग और कांग्रेस रिवाइवल प्लान देने के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नयी दिल्ली का दौरा हुआ, जिसके दौरान वह सोनिया गांधी, राहुल गांधी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और कई अन्य विपक्षी दलों के नेताओं से मिलीं. ममता बनर्जी के दिल्ली से वापस कोलकाता जाने के कुछ ही दिनों बाद राहुल गांधी ने विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए नाश्ते पर चर्चा का कार्यक्रम बनाया जिसमें 15 विपक्षी दल शामिल हुए. राहुल गांधी ने यह कार्यक्रम 3 अगस्त को किया और उसके ठीक दो दिनों के बाद, यानि 5 अगस्त को प्रशांत किशोर ने पंजाब मुख्यमंत्री के प्रमुख सलाहकार पद से, जिसके अंतर्गत उन्हें कांग्रेस पार्टी की जीत सुनियोजित करना था, इस्तीफा दे दिया. लगता है कि कहीं ना कहीं राहुल गांधी के नाश्ते पर चर्चा कार्यक्रम से प्रशांत किशोर के इस्तीफे का सीधा तार जुड़ा हुआ है.
यह पहली बार नहीं है कि प्रशांत किशोर ने चुनाव के पहले कांग्रेस पार्टी से अपने आपको दूर कर लिया हो. 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के शुरूआती दौर में वह कांग्रेस पार्टी के साथ एक सलाहकार के तौर पर जुड़े थे. एक इंटरव्यू में प्रशांत किशोर ने बताया कि जहां उनकी योजना थी कि प्रियंका गांधी को चुनाव में कांग्रेस पार्टी के चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया जाए, राहुल गांधी ने उनकी बात नहीं मानी और बिना उनसे सलाह किये समाजवादी पार्टी से गठबंधन की घोषणा कर दी जो प्रशांत किशोर की रणनीति का हिस्सा नहीं था. प्रशांत किशोर ने अपने कदम पीछे खींच लिए और समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में कांग्रेस पार्टी 105 सीटों पर चुनाव लड़ी, 21 सीटों का नुकसान हुआ और 403 सदस्यों वाली विधानसभा में पार्टी मात्र 7 सीटें ही जीतने में सफल हुई.
ऐसा प्रतीत हो रहा है कि राहुल गांधी की जिद और जल्दीबाजी का ही नतीजा है कि प्रशांत किशोर ने कांग्रेस पार्टी से अपने आप को दूर करने का फैसला किया है. उन्हें शायद अमरिंदर सिंह से कोई शिकायत नहीं थी, पर राहुल गांधी की जल्दबाजी कि उनकी जगह ममता बनर्जी विपक्ष की तरफ से साझा प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार ना बन जाएं के विरोध में प्रशांत किशोर ने अपने आप को कांग्रेस पार्टी से दूर करने का निर्णय कर लिया है. प्रशांत किशोर की रणनीति थी की पहले सभी गैर-बीजेपी दलों को इकट्ठा किया जाए और ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश किया जाए.
उनका सोचना सही भी था, कि जो सिक्का दो बार बाज़ार में नहीं चला वह अब तीसरी बार कैसे चल जाएगा? राहुल गांधी 2014 और 2019 के चुनाव में यूपीए की तरफ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे. नरेन्द्र मोदी के सामने वह टिक नहीं पाए और कांग्रेस पार्टी डूबती ही चली गयी. अब यह सोचना कि तीसरी बार भारत के मतदाता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए नरेन्द्र मोदी के खिलाफ वोट डालेंगे किसी शेख चिल्ली के सपने जैसा लगता है.
प्रशांत किशोर का ईगो भी है, और हो भी क्यों ना? वह अपने फन में माहिर हैं जिसका लोहा अब सभी मानते हैं. 2014 में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की कामयाब रणनीति, 2017 में कैप्टन अमरिंदर सिंह को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाने में सफलता, 2019 में आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी की एकतरफा जीत, और इस वर्ष तमिलनाडु में डीमके और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की भारी जीत के बाद किसी को भी अपने आप पर गुमान होना स्वाभाविक है, प्रशांत किशोर इसके अपवाद नहीं हो सकते. इन सभी चुनावों में उनकी रणनीति सफल रही थी.
रही बात उनके इस्तीफे का पंजाब विधानसभा चुनाव पर असर की तो यह भी संभव है कि प्रशांत किशोर को लगने लगा होगा कि पंजाब में कांग्रेस पार्टी की जीत आसान नहीं होगी. भले ही अमरिंदर सिंह सिद्धू की ताजपोशी कार्यक्रम में शामिल हुए हों, पर पंजाब कांग्रेस में उठापटक बदस्तूर जारी है, जिसका सीधा प्रभाव चुनाव पर पड़ सकता है. अगर पंजाब में कांग्रेस पार्टी जीत भी जाए तो उसके बाद राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी बढ़ जायेगी, जिसका परिणाम प्रशांत किशोर को पता है, लिहाजा उन्होंने सोचा कि अभी से कांग्रेस पार्टी से दूर जाना बेहतर है, ताकि उनके दामन पर कोई दाग ना लगे. बेचारे अमरिंदर सिंह, बेवजह ही राहुल गांधी की जल्दीबाजी का शिकार बनते दिख रहे हैं और अब बिना प्रशांत किशोर की सलाह और रणनीति के उनका जीतना इतना आसान नहीं रहेगा.
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