दाह संस्कार में चिता जलाने के लिए लकड़ियों के इस्तेमाल से प्रदूषण फैलने और पर्यावरण को नुकसान होने वाली एनजीटी यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की रिपोर्ट को शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती समेत दूसरे साधू- संतों ने खारिज करते हुए इसे मानने से इंकार कर दिया है।
साधू संतों का कहना है कि पर्यावरण को बचाने के लिए वह हरे पेड़ों को काटे जाने के खिलाफ हैं, लेकिन एनजीटी की इस सलाह को मानने को राजी नहीं हैं, क्योंकि चिता में सिर्फ सूखे पेड़ों की लकड़ियाँ ही इस्तेमाल होती हैं।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की रिपोर्ट पर द्वारिका और ज्योतिर्पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने नाराज़गी जताते हुए कहा है कि लकड़ी जलने से कोई प्रदूषण नहीं होता, बल्कि प्रदूषण शवों के जलने पर निकलने वाले धुंएं से होता है। उनके मुताबिक़ हिन्दू सहनशील होता है इसीलिये सारी पाबंदियां उसी पर थोपी जाती हैं। एनजीटी की रिपोर्ट धर्म के खिलाफ है, इसलिए वे उसे खारिज करते हैं और दुसरे लोगों को भी इस सलाह को नहीं मानना चाहिए व चिता जलाने के लिए लकड़ियों का ही इस्तेमाल करना चाहिए। शंकराचार्य के मुताबिक़ एनजीटी की रिपोर्ट अवैज्ञानिक है और उसका कोई आधार नहीं है। उनके मुताबिक़ लकड़ी का कोई दूसरा विकल्प उन्हें मंजूर नहीं हैं।
धर्मगुरु वासुदेवानंद सरस्वती ने कहा है कि अगर लकड़ियों के बजाय बिजली से भी दाह संस्कार किया जाए तो वह गलत नहीं होगा, लेकिन परम्पराएं छोड़ने के लिए लोगों को तुरंत मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
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