पश्चिम बंगाल सरकार ने के जरिए फोन की जासूसी मामले में एक जांच आयोग का गठन किया है. दिल्ली जाने के पहले बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने जांच आयोग गठन का ऐलान किया था, लेकिन बंगाल सरकार द्वारा गठित जांच आयोग से केंद्र सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. यह आयोग देश भर में किसी को भी जांच के लिए तलब कर सकता है. इस आयोग में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मदन बी लोकुर और कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस ज्योतिर्मय भट्टाचार्य शामिल हैं.राज्य सरकार द्वारा जारी अध्यादेश के मुताबिक यह आयोग जासूसी मामले की जांच करेगा और यह पता लगाएगा कि इसके जरिए जुटाई गई जानकारियों का इस्तेमाल किस तरह से किया गया. अधिसूचना के मुताबिक यह ‘सार्वजनिक महत्व का निश्चित मामला’ है. बता दें कि इजराइल की कंपनी NSO ग्रुप के स्पाइवेयर पेगासस के जरिए केंद्रीय मंत्रियों, विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, कारोबारियों और अहम पदों पर बैठे सरकारी अधिकारियों की जासूसी किए जाने के आरोप लग रहे हैं. यह मामला दुनिया भर की 17 मीडिया एजेंसियों की वैश्विक जांच से सामने आया है.
संवैधानिक नियम के अनुसार किसी मामले की जांच के लिए केंद्र और राज्य सरकारों, दोनों को ही इस प्रकार के आयोग गठित करने की शक्ति है. हालांकि राज्यों के पास इसे लेकर सीमित शक्तियां हैं कि किन विषयों को लेकर यह आयोग का गठन कर सकती है. कमीशंस ऑफ इंक्यावरी एक्ट, 1952 के तहत सरकार द्वारा गठित किए गए आयोग के पास सिविल कोर्ट की शक्तियां होती हैं. यह कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर, 1908 के तहत मामला दर्ज कर सकती है. इसका मतलब हुआ कि इसके पास देश के किसी भी हिस्से से किसी भी शख्स को समन भेजकर उपस्थित होने का आदेश देने की शक्ति है. इसके अलावा इस एक्ट के तहत गठित आयोग के पास देश के किसी भी कोर्ट या ऑफिस से कोई पब्लिक रिकॉर्ड कॉपी मंगाने की शक्ति होती है. एक्ट के सेक्शन 5 के तहत जांच से संबंधित किसी भी महत्वपूर्ण जानकारी के लिए किसी शख्स को बुला सकती है, चाहे वह किसी भी शक्तिशाली पद पर हो. बता दें कि पहले में 2002 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जस्टिस जीटी नानावटी और जस्टिस एएच मेहता ने गोधरा ट्रेन को जलाए जाने और उसके बाद राज्य में होने वाले दंगो की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया था.वास्तव में ममता बनर्जी ने आयोग का गठन कर केंद्र सरकार पर इस मामले पर प्रतिक्रिया देने का दबाव बढ़ाया है. वह लगातार इस मामले पर केंद्र सरकार पर हमला बोल रही हैं और तृणमूल कांग्रेस के सांसद संसद में इसे उठा ररहे हैं. पश्चिम बंगाल सरकार ने छह महीने के भीतर लोकुर आयोग को रिपोर्ट पेश करने को कहा है. हालांकि सरकार इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिए बाध्य नहीं है. इस रिपोर्ट की फाइंडिग्स को लागू करने के लिए राज्य सरकार बाध्य नहीं है लेकिन इसे कोर्ट में तथ्य के तौर पर पेश किया जा सकता है. नानावटी आयोग ने गुजरात सरकार को अपनी रिपोर्ट में क्लीन चिट दी थी.
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