अगर कोई व्यक्ति सफल हो, साथ ही उनकी पत्नी भी सफल हस्ती हों तो समझ लीजिए दोनों एक दूसरे को कॉम्प्लिमेंट करते हैं, एक दूसरे का सक्सेस सेलिब्रेट करते हैं. लेकिन एक दूसरी स्थिति भी होती है. कोई व्यक्ति किसी राज्य का मुख्यमंत्री बन चुका हो. उनकी पत्नी हमेशा उनके साथ खड़ी दिखाई देती हों. लेकिन उनके बारे में कहीं कुछ पढ़ने-सुनने को ना मिलता हो, कहीं कुछ भी नहीं छपता हो. इसका मतलब यह है कि उस पत्नी ने अपना अस्तित्व समर्पित कर एक सफल व्यक्तित्व को गढ़ा है. ऐसी पत्नियां वो होती हैं जो अपने आप को खोकर अपने पति की हो जाती हैं. समझ लीजिए कि महाराष्ट्र में अगर उद्धव ठाकरे नाम का कोई हीरा है तो साथ में रश्मि ठाकरे नाम का पन्ना जड़ा है. हीरे और पन्ने की इस जोड़ी की पहली मुलाकात की दास्तान बड़ी रोचक है. यह वो राज़ है जो बहुत कम लोगों को ही पता है. यह राज़ राज ठाकरे से जुड़ता है.जो लोग ठाकरे परिवार को करीब से जानते हैं, वो बताते हैं कि रश्मि ठाकरे राज ठाकरे की बहन जयवंती ठाकरे की सहेली थीं. जयवंती ठाकरे ने ही रश्मि ठाकरे को पहली बार उद्धव ठाकरे से मिलवाया था. तब उद्धव ठाकरे राजनीति में बहुत सक्रिय नहीं थे. वो फोटोग्राफी किया करते थे. उन्होंने अपनी एक ऐड एजेंसी शुरू की थी. यह पहचान धीरे-धीरे दोस्ती में बदली और दोस्ती प्यार में बदल गई. 13 दिसंबर 1988 को दोनों ने एक-दूसरे के साथ सात फेरे ले लिए.
उद्धव ठाकरे के राजनीतिक जीवन में कई अच्छे-बुरे दौर आए. अच्छे दौर में रश्मि ठाकरे की मुस्कुराहट ठहाकों में नहीं बदली, बुरे दौर में रश्मि ठाकरे की ज़ुबान विपक्षियों को लेकर नहीं फिसलीं. मुलायम इतनी कि विपक्षियों के खिलाफ शिकायतों से भरे tweets नहीं करतीं, मज़बूत इतनी कि अपने संघर्षों में कभी quit नहीं करतीं. संयम से अच्छे दौर का इंतजार करती हैं, अच्छा दौर आता है तो सबसे सौम्य व्यवहार रखती हैं.रश्मि ठाकरे का जन्म डोंबिवली के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ. शादी से पहले उनका सरनेम पाटणकर था. 1987 में उन्होंने एलआईसी में कॉन्ट्रैक्ट में नौकरी ज्वाइन की. एलआईसी की नौकरी के दौरान ही उनकी पहचान जयवंती ठाकरे से हुई. और जयवंती ठाकरे ने इन्हें उद्धव ठाकरे से मिलवाया. आज उद्धव ठाकरे के राजनीतिक मामले में इनका कितना असर है, यह नहीं पता, लेकिन शिवसेना का उतार-चढ़ाव इन्होंने काफी करीब से देखा है. मध्यमवर्गीय संस्कार में पली-बढ़ी हैं, एक आम परिवार की तरह माता-पिता के साथ रहते हुए जीवन का सुख और संताप देखा है, ससुर बाला साहेब ठाकरे का प्रताप देखा है, पति के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका प्रभाव देखा है, पुत्र को मंत्री बनते हुए उनका आविर्भाव देखा है.आज मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का जन्म दिन है. महाराष्ट्र में बरसात और बाढ़ की परिस्थियों को देखते हुए उन्होंने अपने मानने और जानने वालों को जन्मदिन का उत्सव ना मनाने की सलाह दी है. आखिर में एक बात तो कहनी पड़ेगी. इस बारे में भले ही अलग-अलग मत हो सकते हैं कि उद्धव ठाकरे कितने सफल मुख्यमंत्री रहे हैं. लेकिन इतना तो ज़रूर कहा जा सकता है कि वे जब बाढ़ग्रस्त इलाकों का दौरा करते हैं, तो एक महिला उनसे रोकर अपना हाल सुनाती है, उन पर चीखती है चिल्लाती है, उन्हें यह कहते हुए चेतावनी भी देती है कि मदद किए बिना वापस ना जाना… इतना खुल कर जनता अपनी वेदना इस मुख्यमंत्री से कह सकती है. यह वो मुख्यमंत्री है जो उनके गुस्से को, उनकी वेदना को सुन और समझ सकता है. यह वो मुख्यमंत्री है जो आपदा के बाद रोबोट की तरह दौरे पर नहीं आता है, पुराने पाठशाला के कठोर मास्टर की तरह छड़ी नहीं घुमाता है…एक परिवार के सदस्य की तरह आंसू पोंछ जाता है, ग़म बांट जाता है…यही क्या कम है…
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