प्रयागराज। कोरोना काल में निजी अस्पतालों ने इलाज के नाम पर मजबूर लोगों को किस कदर लूटा यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसा ही एक और मामला सामने आया है जिसमें एक निजी अस्पताल ने कोरोना संक्रमित बुजुर्ग को 13 दिनों तक अस्पताल में रखकर 4.50 लाख का बिल बनाया। इस दौरान अस्पताल के कर्मचारी बुजुर्ग की हालत में सुधार बताते रहे।
13 दिन बाद जब मरीज को डिस्चार्ज किया गया तो घर जाते ही उनकी हालत बिगड़ गई और अगले दिन दूसरे अस्पताल में मौत हो गई। मेंहदौरी कॉलोनी निवासी बीटेक छात्र वैभव त्रिपाठी ने बताया कि कुछ दिनों पहले उसके दादा कृष्ण चंद्र त्रिपाठी, दादी सुशीला, चाचा अभिषेक और चाची शिल्पी त्रिपाठी कोरोना संक्रमित हो गए थे। दादा की हालत बिगड़ने पर उन्हें शहर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया। जहां उनसे एडवांस डेढ़ लाख रुपये जमा कराए गए। इस दौरान अस्पताल के कर्मचारी फोन से बताते रहे कि कृष्ण चंद्र की हालत में सुधार है। पीड़ित परिवार का आरोप है कि 13 दिन बाद अस्पताल ने 4.50 लाख रुपये का बिल दिया और कहा कि भुगतान करने के बाद ही मरीज ले जा सकते हैं।
यह देख पीड़ित परिवार ने लाखों का फर्जी बिल बनाने की शिकायत पुलिस से की। जार्जटाउन पुलिस के कहने पर अस्पताल संचालक ने डेढ़ लाख रुपये कम किए। अगले दिन तीन लाख रुपये जमा करने के बाद कृष्ण चंद्र को डिस्चार्ज किया गया। वैभव का आरोप है कि डिस्चार्ज करते समय अस्पताल ने उनके दादा का आक्सीजन लेवल 93-94 बताया था जबकि घर पहुंचने पर ऑक्सीजन लेवल 67 था। यह देख उसने तुरंत ऑक्सीजन सिलेंडर का इंतजाम किया। अगले दिन रेलवे अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां जांच में पता चला कि कृष्ण चंद्र का फेफड़ा बुरी तरीके से संक्रमित हो चुका था। दूसरे ही दिन कृष्ण चंद्र ने दम तोड़ दिया। घरवालों का आरोप है कि अस्पताल में सही जानकारी नहीं दी गई और इलाज के नाम पर लाखों रुपये लूट लिए।
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