मंझनपुर। जिला मुख्यालय से 29 किमी दूर है शाहपुर गांव। यमुना की तराई में बसा यह गांव मौजूदा समय तप रहा है। रेत आग उगल रही है। इस गांव के हर बाशिंदें की आंख में खौफ है, दहशत है। महामारी जेहन में घर कर चुकी है। घर-घर बीमारी फैली है। मोहल्ले-मोहल्ले मातम है। किसी ने अपनी मां को खोया है तो किसी ने अपने भाई को। कोरोना महामारी की कील गहरे तक पैबस्त है। यही कारण है कि लोग तिलमिला रहे हैं। गांव के कोने-कोने में गमछा, मास्क लगाकर बैठे लोग बीमारी की चर्चा कर रहे हैं। मदद व गुहार लगाई जा रही है, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। अब तो गांव वाले चीखने-चिल्लाने लगे हैं कि आखिर कब यहां टीम आएगी। कब गांव के लोगों की सुधि ली जाएगी। सवाल यह भी है कि मातम रुकेगा या ये दौर चलता ही रहेगा।
सरसवां ब्लाक का शाहपुर गांव। गांव के बाहर ही होम्योपैथिक अस्पताल है, इसी भवन से सटकर बना है प्राथमिक उप स्वास्थ्य केंद्र। मंगलवार का दिन था, लेकिन दोनों भवनों में ताला बंद था। गांव में एकदम सन्नाटा था। सड़क पर कोई दिख नहीं रहा था। तिराहे से उत्तर की ओर जाने वाली सड़क पर एक आलीशान भवन के गेट के अंदर लोग पेड़ के नीचे बैठे थे। सभी लोग गमछा बांधे थे। कईयों ने मास्क लगा रखा था। इनके बीच प्रधान प्रतिनिधि ओपी सिंह भी बालू के ढेर में बैठे थे। सबके चेहरे पर चिंता थी, महामारी को लेकर भय था। गांव के रज्जन सिंह ने बात ही बात में कह दिया कि अब कब टीम आई, जब पूरा गांव खंडहर होई जाई तब। बातचीत के दौरान चौंकाने के साथ ही कलेजा कंपाने वाली जानकारी आई। लोगों ने बताया कि एक महीने के भीतर गांव के ही राधेश्याम महराज, अंशू गुरूजी, शशि सिंह की दादी, अजय सिंह की मां, गरीबदास केवट, लंगड़ा, आनंद सेठ की भयाहू, बब्बू गौतम, अरुण टिकहार की मां की मौत हो चुकी है। गांव के लोगों ने बताया कि इनके अलावा कितनी मौत हुई पता नहीं, लेकिन इससे ज्यादा मौत हुई है। पांच हजार की आबादी वाले इस गांव में 20 फीसदी लोग बीमार पड़े हैं। किसी को सर्दी है तो किसी को जुकाम। खांसी वाले मरीजों का बुरा हाल है। बताया कि मदद मांगी जा रही है। टीम को भेजने की गुहार लगाई जा रही है, लेकिन कोई सुनने को ही नहीं तैयार। कोई हाल तक नहीं पूछने आ रहा है। सरकार तमाम दावे कर रही है, लेकिन यमुना किनारे बसे इस गांव में कोई आए तो हमसे पूछने कि हम कैसे जी रहे हैं। हमें तो मरने के लिए छोड़ दिया गया है। बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि मोहल्ले से निकलने पर अभी भी रोने की आवाजें सुनाई देती हैं। अब रूदन सुनकर हिम्मत जवाब देने लगी है। कोई तो हमारा पालनहार बनेगा, बस इसी उम्मीद में जी रहे हैं!
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