REPORT
AJAY KUMAR
KAUSHAMBI"
मेले में विभिन्न प्रकार के घोडे , गधे ,खच्चरों की भरमार है| कोई इन्हें इस मेले में बेचने आया है तो कोई खरीदने | मेले की खासियत यह है की यहाँ के गधो व खच्चरों को जम्मू कश्मीर के व्यापारी अधिक पसंद करते है | मेले में किसी में जानवर दुसरे जानवरों की झुंड में खो न जाये इसी लिए इनके ऊपर रंगों से विशेष निशान बनाये जाते है | मेले में बारे में कहा जाता है पौराणिक मान्यता के मुताबिक गदर्भ (गधा) देवी शीतला की सवारी है| इसी लिए कड़ा शीतला धाम में ऐसा मेला लगता है| इस तरह का अलबेला गधों का मेला और कहीं नहीं लगता है | इस मेले में राजस्थान , बिहार , म.प्र. , जैसे कई राज्यों के लोग आते है | यहाँ काफी महगे जानवर बिकते है जिनकी कीमत हजारो में होती है | तीन दिन तक चलने वाले इस मेले में गधा, खच्चर व घोड़ों की खरीद फरोक्त की संख्या हजारों में पहुँच जाती है| मेले में जुटे धोबी समाज के तमाम लोग अपने लडके व लड़कियों का रिश्ता भी तय करते है| मान्यता है कि शीतला धाम में तय किया गया रिश्ता अटूट होता हैइस मेले में गधो के खाने पीने से लेकर सजाने सवारने तक के सभी सामन आसानी से मिलते है| मेले में बिकने से पहले गधों के सजाया सवारा भी जाता है| सजाने के लिए तरह तरह के साजो सामान व खाने के लिए बेहतरीन भोजन बेचने वाले व्यापारी भी मेले की रौनक बढ़ाते है| दो दिन तक चलने वाले इस मेले की सुर्खिया देश के कोने कोने तक फैली हुई है| कई प्रदेशों के व्यापारी यहाँ से गधा, घोडा व खच्चर की खरीद फरोक्त होती हशीतला धाम में जिस तरह का अनोखा गदर्भ (गधा) मेला लगता है, ऐसा मेला शायद ही देश के किसी स्थान पर लगता हो । यहाँ पहुँचने वाले गधा, घोडा व् खच्चर के मालिकों को किसी तरह की परेशानी न हो इसलिए इन जानवरों पर विशेष तरह से निशान लगाये जाते है। इंसानों के मेले तो सभी ने खूब देखें होंगे लेकिन ऐतिहासिक गधों का यह अलबेला मेला वास्तव में अपने आप में अलग पहचान बनाये हुए है। जिसे देखने के लिए इंसानों की भी भीड़ जुटती है। यहाँ पर सबसे अधिक "टीपू" नस्ल के गधों की खरीद फरोक्त होती है। "टीपू" नस्ल के वही गधे व्यापारियों को पसंद होतें है जिनकी लम्बाई साढ़े छह बालिस (बिस्ता) होती है
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